सोशल मीडिया पर सरकार या नेताओं पर सवाल उठाना लोकतंत्र की जान है, लेकिन जब बात भाषा की मर्यादा लांघने पर आ जाए, तो बात कानूनी दांव-पेच तक पहुंच ही जाती है। हाल ही में त्रिपुरा हाईकोर्ट ने प्रधानमंत्री के खिलाफ कथित आपत्तिजनक टिप्पणियों से जुड़े मामलों को खारिज करने से साफ इनकार कर दिया। कोर्ट ने बहुत आसान शब्दों में समझाया कि किसी संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति की नीतियों का विरोध करना एक बात है, और उनके सम्मान को ठेस पहुंचाना बिल्कुल दूसरी बात।
क्या है पूरा मामला? यह पूरा विवाद कंटेंट क्रिएटर माधबी बिस्वास चक्रवर्ती की अर्जियों से जुड़ा है। उनके खिलाफ ईस्ट और वेस्ट अगरतला थानों में एफआईआर (FIR) दर्ज हुई थी और पुलिस चार्जशीट भी दाखिल कर चुकी थी। माधबी ने हाईकोर्ट से इन दोनों को रद्द करने की गुहार लगाई थी।
शिकायत के मुताबिक, उन्होंने पीएम मोदी और अगरतला के मेयर के खिलाफ अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया था। इसके अलावा, राज्य सरकार का कहना था कि माता त्रिपुरेश्वरी को लेकर की गई एक टिप्पणी से लोगों की धार्मिक भावनाएं आहत हुईं और शुरुआती जांच में आरोप सही पाए गए।
मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस ने माधबी को गिरफ्तार किया था। बाद में हाईकोर्ट ने उन्हें जनवरी में अंतरिम और फरवरी में स्थायी जमानत दे दी। इसके बाद उन्होंने कोर्ट में दलील दी कि:
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उनके बयान सिर्फ एक राजनीतिक राय थे, जो संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत बोलने की आजादी (Freedom of Speech) में आते हैं।
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इन बयानों में आपराधिक मानहानि जैसी कोई नीयत नहीं थी और यह कार्रवाई सिर्फ राजनीति से प्रेरित है।
सरकार का रुख और हाईकोर्ट का फैसला राज्य सरकार ने इन दलीलों को सिरे से खारिज कर दिया। उनका तर्क था कि ये टिप्पणियां अनजाने में नहीं, बल्कि जानबूझकर माहौल खराब करने और प्रतिष्ठा गिराने के लिए की गई थीं। सरकार ने कहा कि इस मोड़ पर केस बंद करना सही नहीं होगा, सच क्या है यह तो ट्रायल (निचली अदालत की सुनवाई) में ही साफ होगा।
न्यायमूर्ति टी. अमरनाथ गौड़ और न्यायमूर्ति एस. दत्ता पुरकायस्थ की पीठ ने इस पर सुनवाई करते हुए बेहद जरूरी बात कही। कोर्ट ने माना कि आजकल लोग सोशल मीडिया पर अपनी बात खुलकर रखते हैं, जो अच्छी बात है। लेकिन यही प्लेटफॉर्म अब ट्रॉलिंग, साइबर मानहानि और किसी को बदनाम करने का अड्डा भी बनता जा रहा है।
अदालत की अहम टिप्पणी: “संविधान आपको अपनी बात रखने का अधिकार देता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि आप किसी की छवि खराब करने का लाइसेंस पा गए हैं। बिना सबूत के गंभीर आरोप लगाना, झूठी बातें फैलाना या किसी को नीचा दिखाना सीधे तौर पर कानूनी कार्रवाई को न्योता देना है।”
आलोचना और अपमान का फर्क समझना जरूरी कोर्ट के इस फैसले का सबसे बड़ा संदेश यह है कि विरोध और बदतमीजी में बहुत बारीक अंतर होता है। एक नागरिक के तौर पर आप प्रधानमंत्री या किसी भी नेता की नीतियों, उनके काम और फैसलों की धज्जियां उड़ा सकते हैं—यह आपका लोकतांत्रिक हक है।
लेकिन जैसे ही आप नीतियों को छोड़कर व्यक्ति पर आते हैं, गाली-गलौज या दुर्भावनापूर्ण भाषा अपनाते हैं, तो आप कानून के दायरे में आ जाते हैं। फिर आप इसे महज ‘मेरी अपनी राय’ कहकर नहीं बच सकते।
डिजिटल दौर का सबसे बड़ा खतरा सोशल मीडिया की स्पीड जितनी तेज है, इसका नुकसान भी उतना ही बड़ा है। एक गलत या आपत्तिजनक पोस्ट कुछ ही सेकंडों में हजारों-लाखों लोगों तक पहुंच जाती है। लोग स्क्रीनशॉट ले लेते हैं, री-पोस्ट करते हैं, जिससे बात हाथ से निकल जाती है। कोर्ट ने इसी खतरे को भांपते हुए कहा कि डिजिटल दुनिया में अपनी बात रखते वक्त तथ्यों और भाषा का ध्यान रखना बेहद जरूरी है।
तो क्या पीएम का विरोध करना अपराध है? बिल्कुल नहीं। इस फैसले का मतलब यह कतई नहीं है कि आप प्रधानमंत्री या सरकार की आलोचना नहीं कर सकते। कोर्ट ने खुद दोहराया है कि राजनीतिक असहमति लोकतंत्र का हिस्सा है। पंगा आलोचना से नहीं, बल्कि इस्तेमाल की गई घटिया भाषा और छवि खराब करने की नीयत से है।
आगे क्या होगा? त्रिपुरा हाईकोर्ट ने याचिकाओं को खारिज करते हुए मामला निचली अदालत पर छोड़ दिया है। कोर्ट का मानना है कि आरोपों में इतनी सच्चाई जरूर है कि इस पर पूरा ट्रायल चलाया जाए। अब यह ट्रायल कोर्ट तय करेगी कि बयानों में अपराध की नीयत थी या नहीं।
कुल मिलाकर, अदालत का यह फैसला सोशल मीडिया इस्तेमाल करने वाले हर शख्स के लिए एक रिमाइंडर है—डिजिटल स्पेस में आजादी तो पूरी है, लेकिन जिम्मेदारी के बिना यह आजादी आपको सीधे कोर्ट-कचहरी के चक्कर कटवा सकती है।