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केयरटेकर या नौकर को जब मकान मालिक बोले तब खाली करना होगा मकान या प्रॉपर्टी, जानिए क्या कहा है सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में

अक्सर ही किराएदार और मकान वाले के बीच कोई ना कोई नोकझोंक तो होती ही रहती हैं और यदि यह नोकझोंक को ज्यादा बढ़ जाती हैं तो लोग कोर्ट का दरवाजा भी खटखटा देते हैं! और इस बीच देश की सर्वोच्च न्यायालय के द्वारा प्रॉपर्टी को लेकर केयरटेकर के दावे के संबंध में एक बड़ा फैसला सुनाया गया! देश की सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले के अंदर कहा है कि एक केयरटेकर या फिर नौकर लंबे समय तक कब्जे के बावजूद संपत्ति पर कभी दावा नहीं कर सकता! सुप्रीम कोर्ट का यह भी कहना है कि जब मालिक कहेगा तो उसे उस मकान को या प्रॉपर्टी को खाली ही करना पड़ेगा!

यहां आपको बता दें कि न्यायाधीश अजय रस्तोगी और जस्टिस अभय ओका की पीठ ने यह बात ट्रायल जज के आदेश के खिलाफ दायर अपील पर सुनवाई करने के दौरान सही है वही ट्रायल कोर्ट के द्वारा दिए गए आदेश की पुष्टि हाईकोर्ट ने भी की थी! बता दें कि सर्वोच्च न्यायालय की अपील कर्ता ने एक संपत्ति खरीदने के लिए मालिक के साथ एग्रीमेंट साइन किया था सेल डीड के माध्यम से अपील कर्ता का उस संपत्ति के ऊपर स्वामित्व का अधिकार हो गया सुप्रीम कोर्ट के सामने प्रतिवादी को उस संपत्ति से पहले मालिक के द्वारा एक केयरटेकर के तौर पर नियुक्त किया गया था वही पहले मालिक की तरफ से प्रतिवादी को उस संपत्ति पर निवास करने की अनुमति दी गई थी!

वही प्रतिवादी के मुकदमा दायर किया गया जिसने इस बात का भी दावा किया गया था कि केयरटेकर के तौर पर उसका उस संपत्ति के ऊपर वेद कब्जा है और वह संपत्ति का एकमात्र मालिक है उसने उसे संपत्ति के बेदखल करने से रोकने के लिए स्थाई निषेधाज्ञा की मांग भी की है! वहीं इसी मामले को लेकर सबसे दिलचस्प बात तो यह रही है कि उसके अनुसार निचली अदालत और हाईकोर्ट ने मकान मालिक की याचिका पर सुनवाई करने से इंकार कर दिया इस याचिका में केयरटेकर ने खुद को संपत्ति परिषद से खाली नहीं कराने की गुहार लगाई थी अदालत के द्वारा उस याचिका पर आगे की कार्रवाई करने से मना कर दिया गया!

वही बता दे कि ट्रायल जज ने इसे वि वाद विषय वस्तु और उसकी जांच केवल मालिक के कहने पर लिखित बयान दर्ज किए जाने के बाद ही की जा सकती है इस को आधार मानते हुए आवेदन को खारिज कर दिया गया था! वही निचली अदालत ने कहा था कि यह आदेश VII नियम 11 सिविल प्रक्रिया संहिता के दायरे में नहीं है और निचली अदालत के द्वारा दिए गए आदेश की पुष्टि हाई कोर्ट के द्वारा भी की गई थी!

वही आपको जानकारी दे दे कि सीपीसी के आदेश-7 नियम 11 (डी) में यह प्रावधान है कि वाद पत्र में दिया गया बयान यदि किसी भी कानून के द्वारा मस्जिद लगता है तो ऐसी स्थिति में वाद खारिज कर दिया जाएगा वहीं अब निचली अदालत ने इस आदेश को जस्टिस अजय रस्तोगी की अध्यक्षता वाली पीठ ने रद्द कर दिया है!

उन्होंने कहा है कि इस मामले के अंदर साफ तौर पर ट्रायल कोर्ट की ही गलती है जस्टिस ने यह भी कहा कि केयरटेकर या नौकर का लंबे समय तक संपत्ति पर कब्जा हो तो इसके बावजूद भी कभी भी संपत्ति में वह अधिकार हासिल ही नहीं कर सकता है उन्होंने यह भी बताया है कि जहां तक प्रतिकूल कब्जे की दलील का संबंध है मालिक के कहने पर नौकर कल को तुरंत कब्जा देना पड़ेगा!

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