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सदन में गृहमंत्री ने पेश किया बिल, विरोधियों के उड़े होश

मध्य प्रदेश के लोक एवं निजी संपत्ति को नुकसान का निवारण एवं नुकसानी की वसूली विधेयक 2021 को बुधवार को मध्य प्रदेश के विधानसभा के शीतकालीन सत्र में पेश किया जाएगा वहीं इस विधेयक को मंजूरी मिलने की पूरी संभावना जताई जा रही है इसके तहत क्लैम्स ट्रिब्यूनल बनाने उसके अधिकारों और दायित्वों को तय करने के साथ ही वसूली जाने वाले हर्जाने की राशि नुकसान से दोगुना रखने के भी प्रावधान है वही मध्य प्रदेश के कैबिनेट ने पिछले ही हफ्ते इस विधेयक को मंजूरी दी थी!

वहीं राज्य के गृह मंत्री डॉ नरोत्तम मिश्रा ने मीडिया के साथ बातचीत की है और इस दौरान विधेयक का ड्राफ्ट पेश किया था वहीं इसके मुताबिक राज्य के अंदर अगर किसी भी प्रकार का कोई भी नुकसान किया जाता है तो उसकी भरपाई का अधिकार यह भी दे देता है वहीं इनमें केंद्र सरकार राज्य सरकार स्थानीय निकाय के साथ ही सहकारी संस्थाओं कंपनियों की संपत्तियों को पहुंचने वाला नुकसान है!

दावा न्यायाधिकरण का गठन निश्चित समय के लिए होगा

राज्य सरकार ऐसे क्षेत्र और अवधि के लिए एक दावा अधिकरण का गठन करेगी, जो इस विधेयक में उल्लिखित प्रावधानों के तहत नुकसान की राशि तय करेगी। सरकारी संपत्ति के संबंध में कलेक्टर या कार्यालय प्रमुख और निजी संपत्ति के मामले में उसके मालिक या नियंत्रक 30 दिनों के भीतर दावा अधिकरण को आवेदन करेंगे। दावा अधिकरण इसके तहत एक दावा आयुक्त की नियुक्ति करेगा। इससे नुकसान का आकलन करने में मदद मिलेगी।

उकसाने वाले से हर्जाना वसूल करेंगे

प्रस्तावित कानून में एक प्रावधान है कि दावा ट्रिब्यूनल जो भी फैसला सुनाएगा, उस व्यक्ति से नुकसान की वसूली की जाएगी, जिसने संपत्ति को नुकसान पहुंचाया और साथ ही उकसाने वाले भी। क्लेम ट्रिब्यूनल मूल नुकसान के दोगुने तक के पुरस्कार पारित करने में सक्षम होगा। यदि अधिनिर्णय पारित होने के 15 दिनों के भीतर हर्जाने का भुगतान नहीं किया जाता है, तो आवेदक को दावा न्यायाधिकरण में हर्जाने की राशि और किए गए खर्च पर ब्याज वसूल करने का अधिकार होगा।

तीन महीने में होगा हर्जाना

बिल में प्रावधान है कि क्लेम ट्रिब्यूनल को तीन महीने के भीतर हर्जाने या मुआवजे का निर्धारण करना होगा। दावा अधिकरण को सिविल प्रक्रिया संहिता 1908 के तहत दीवानी न्यायालय की शक्तियां और शक्तियां प्रदान की जाएंगी। दावा अधिकरण के आदेश को केवल उच्च न्यायालय में 90 दिनों के भीतर चुनौती दी जा सकती है।

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