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कभी धोते थे झूठे बर्तन आज है अरबपति, जाने रत्न टाटा जी के जन्मदिन पर उनकी अनसुनी कहानी

रतन टाटा का नाम दिग्गज उद्योगपतियों में से एक है। टाटा समूह को दुनिया के सबसे बड़े कॉरपोरेट घरानों में से एक बनाने में रतन टाटा की भूमिका महत्वपूर्ण है। उनके व्यक्तित्व का सबसे बड़ा आकर्षण उनकी सादगी है। इतने बड़े व्यापारिक साम्राज्य को संभालने के दशकों बाद भी उनकी सादगी बरकरार है। रतन टाटा के जमीन से जुड़े होने का कारण आम लोगों की तरह उनका पालन-पोषण है। भले ही वह राजकुमार पैदा हुआ था, लेकिन आम लोगों की तरह उसने भी संघर्ष के साये में पढ़ाई से लेकर करियर तक का सफर तय किया। आपको जानकर हैरानी होगी कि पढ़ाई के दौरान उन्हें रेस्टोरेंट में गंदे बर्तन धोने पड़ते थे और उनके शुरुआती काम में फावड़ा चलाना भी शामिल था।

दादी ने रतन टाटा को सिखाया सादगी का पाठ

आज इस महान शख्सियत का जन्मदिन है। रतन टाटा का जन्म आज ही के दिन 1937 में हुआ था। जेआरडी टाटा के बाद टाटा समूह की बागडोर संभालने से पहले रतन टाटा को जीवन में कई बुरे अनुभवों का सामना करना पड़ा था। उनके माता-पिता के तलाक का उन पर बहुत प्रभाव पड़ा। जब उनकी मां ने दोबारा शादी की तो उन्हें स्कूल में भी ताने का सामना करना पड़ा। कुछ समय पहले रतन टाटा ने इस बारे में अपना अनुभव सोशल मीडिया पर शेयर किया था। उनका कहना है कि अपनी दादी से मिली सीख के चलते वह ऐसे हालातों को नजरअंदाज कर आगे बढ़ते थे।

कॉलेज के दिनों में था प्लेन उड़ाने का भूत

रतन टाटा ने अपनी उच्च शिक्षा अमेरिका की कॉर्नेल यूनिवर्सिटी से की, जहां उन्होंने आर्किटेक्चर की डिग्री ली। बात उन दिनों की है जब रतन टाटा को जहाज उड़ाने का शौक हो गया था। उन दिनों अमेरिका में फीस देकर विमान उड़ाने की सुविधा देने वाले केंद्र खोले जाते थे। उन्हें अपने शौक को पूरा करने का सुनहरा मौका मिला। समस्या केवल पैसों की थी, क्योंकि तब उनके पास फीस भरने के लिए पर्याप्त पैसे नहीं होते थे। उन्होंने प्लेन उड़ाने की फीस कमाने के लिए कई काम किए। इस दौरान उन्होंने कुछ देर रेस्टोरेंट में बर्तन धोने का काम भी किया।

फावड़ा चलाने से टाटा में करियर की शुरुआत

फैमिली बिजनेस में आने से पहले उन्होंने अमेरिका की एक आर्किटेक्चर कंपनी में दो साल तक काम किया। जब वे 1962 में समूह में शामिल हुए, तो उन्हें टेल्को (अब टाटा मोटर्स) के शॉप फ्लोर पर पहली नौकरी मिली। इसके बाद उन्होंने टाटा स्टील से अपने करियर की शुरुआत की। टाटा स्टील में उनकी पहली नौकरी ब्लास्ट फर्नेस टीम में काम करने की थी। इस काम में रतन टाटा फावड़े चलाकर चूना पत्थर उठाते थे।

जेआरडी की विरासत को आगे बढ़ाने के लिए

धीरे-धीरे वह अपनी काबिलियत के दम पर टाटा समूह में एक पायदान ऊपर चढ़ गया। उन्हें 1981 में टाटा इंडस्ट्रीज का अध्यक्ष बनाया गया था और उन्हें जेआरडी के उत्तराधिकारी के रूप में चुना गया था। 1991 में जब जेआरडी टाटा सेवानिवृत्त हुए, तो रतन टाटा को पूरे टाटा समूह की जिम्मेदारी मिली। वह 2012 तक इस पद पर रहे। इस दौरान उनके नेतृत्व में टाटा समूह का राजस्व 100 अरब डॉलर को पार कर गया।

टाटा के खाते में आई कई बड़ी यूरोपीय कंपनियां

रतन टाटा को कॉरपोरेट जगत में उलटे उपनिवेशवाद के लिए भी जाना जाता है। ईस्ट इंडिया कंपनी के चाय व्यवसाय की भारत की दासता के इतिहास में एक प्रमुख भूमिका है। रतन टाटा ने 2000 में ब्रिटेन के मशहूर चाय ब्रांड टेटली को खरीदा और इसे टाटा समूह का हिस्सा बनाया। यह चलन यहीं नहीं रुका, बल्कि 2007 में उन्होंने एंग्लो-डच कंपनी कोरस ग्रुप और 2008 में जगुआर लैंड रोवर का अधिग्रहण कर लिया।

टाटा का कारोबार 100 से अधिक देशों में फैला है

टाटा संस और टाटा समूह के मानद चेयरमैन रतन टाटा के नेतृत्व में समूह की कंपनियों का कारोबार लगातार बढ़ रहा है। हाल ही में टाटा समूह ने सरकारी स्वामित्व वाली एयरलाइन एयर इंडिया का नाम रखा है। यह इसलिए खास हो जाता है क्योंकि एयर इंडिया की जड़ें टाटा समूह के बगीचे में पनपी हैं। फिलहाल टाटा समूह की कंपनियां 100 से ज्यादा देशों में सुई से लेकर टैंक तक का कारोबार कर रही हैं। 29 समूह की कंपनियां खुले बाजार में सूचीबद्ध हैं, जिनका संयुक्त बाजार पूंजीकरण 242 अरब डॉलर है।

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