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भारत में गर्मी का खामोश संकट: 76% आबादी खतरे में, एनआरडीसी रिपोर्ट का अलार्म

मंडपम में आयोजित ग्लोबल हीट एंड कूलिंग फोरम के दौरान जारी एनआरडीसी की ताजा रिपोर्ट ने भारत के सामने जलवायु परिवर्तन की भयावह तस्वीर पेश कर दी है। देश के 57 प्रतिशत जिले अब उच्च से अति-उच्च हीट रिस्क जोन में शुमार हो चुके हैं, जबकि 76 प्रतिशत आबादी सीधे तौर पर गर्मी की चपेट में है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि इस सदी के अंत तक लू की घटनाएं तीन से चार गुना बढ़ जाएंगी।

2024 का भयानक आंकड़ा: 44,000 हीटस्ट्रोक केस
रिपोर्ट के मुताबिक, केवल पिछले साल ही देशभर में 44,000 से ज्यादा हीटस्ट्रोक के मामले दर्ज किए गए। 1992 से 2015 के बीच लू ने 24,000 से अधिक जिंदगियां छीन लीं। दिल्ली-एनसीआर समेत उत्तर भारत के शहरों की स्थिति सबसे चिंताजनक है, जहां कंक्रीट के जंगल और कम हरियाली के कारण दिन की गर्मी रातों में भी छट नहीं पाती। 2025 भारत का 1901 के बाद आठवां सबसे गर्म साल साबित हुआ, औसत तापमान 0.28 डिग्री अधिक दर्ज किया गया।

दिल्ली का ‘अति उच्च जोखिम’ वाला नक्शा
राजधानी के मध्य, उत्तर, उत्तर-पूर्व और दक्षिण-पूर्वी इलाके उच्च जोखिम वाली पट्टी में फंसे हैं। यहां 50 प्रतिशत से ज्यादा जिले अति उच्च श्रेणी में पहुंच चुके। रिपोर्ट बताती है कि रातों का तापमान दिनों से तेजी से बढ़ रहा है, जो आने वाले समय में 70 प्रतिशत तक उछाल मार सकता है। शहरी गर्मी का असर झुग्गीवासियों और बाहर काम करने वाले मजदूरों पर सबसे ज्यादा पड़ रहा।

बदलाव की नई राह: स्थानीय स्तर पर एक्शन
अब भारत के हीट एक्शन प्लान सिर्फ सलाह तक सीमित नहीं। 11 राज्यों ने हीटवेव को राज्य-विशिष्ट आपदा घोषित कर SDRF फंड का इस्तेमाल शुरू कर दिया। वाराणसी, जोधपुर, ठाणे में वार्ड-स्तरीय मैपिंग हो रही। जोधपुर के ‘नेट-जीरो कूलिंग स्टेशन’ बाहरी तापमान से 8-12 डिग्री कम ठंडक देते हैं। दिल्ली के कश्मीरी गेट और आनंद विहार पर ‘कूल रूफ’ तकनीक से गर्मी कम हो रही।

लंबा समाधान: ब्लू-ग्रीन इंफ्रास्ट्रक्चर जरूरी
रिपोर्ट चेतावनी देती है कि पानी बांटना या शेल्टर बनाना काफी नहीं। शहरों में जलाशय, हरियाली और बिना बिजली वाली पैसिव कूलिंग को प्लानिंग का हिस्सा बनाना होगा। ये ‘खामोश आपदा’ अब खुली चुनौती बन चुकी – समय रहते कदम उठाने होंगे वरना कीमत भारी चुकानी पड़ेगी। (एनआरडीसी रिपोर्ट, मंडपम फोरम 2026)

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